महाराज बृहदत जी (चंद्रवंश क्षत्रिय)

 महाराज बृहद्रथ (बृहदत) प्राचीन मगध के प्रतापी और धर्मनिष्ठ शासक थे। उनका उल्लेख में मगध वंश के आदिपुरुष के रूप में मिलता है। उनकी राजधानी गिरिव्रज (वर्तमान राजगीर) थी। वे पराक्रमी होने के साथ-साथ न्यायप्रिय और प्रजावत्सल माने जाते थे। राज्य समृद्ध था, परंतु उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख था।

संतान की कामना से उन्होंने कठोर तपस्या की। एक महर्षि (कथा में प्रायः चंडकौशिक का उल्लेख मिलता है) ने प्रसन्न होकर उन्हें एक दिव्य फल प्रदान किया और कहा कि इसे अपनी रानियों को खिलाएँ। बृहद्रथ की दो रानियाँ थीं, इसलिए उन्होंने फल को दो भागों में बाँटकर दोनों को दे दिया। समय आने पर दोनों रानियों ने आधा-आधा शिशु जन्म दिया। यह अद्भुत और विचित्र स्थिति देखकर वे अत्यंत व्यथित हुईं और उन अर्धशरीरों को त्याग दिया।

कथा के अनुसार वन में जरा वन देवी (अर्थात मां भवानी) की कृपा से उन दोनों भागों का संयोग हुआ और एक पूर्ण, जीवित बालक प्रकट हुआ। इस दिव्य संयोग के कारण बालक का नाम “जरासंध” रखा गया—अर्थात जरा द्वारा संधित (जुड़ा हुआ)। यही बालक आगे चलकर मगध का महापराक्रमी सम्राट बना, जिन्हें के नाम से जाना जाता है।

महाराज बृहद्रथ ने अपने पुत्र को शौर्य, नीति औ


र राज्यकौशल की शिक्षा दी। उनके सुदृढ़ और संगठित शासन ने मगध को मजबूत आधार प्रदान किया, जिस पर आगे चलकर जरासंध ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया और आर्यावर्त की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

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