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"मगध मार्तंड: चक्रवर्ती सम्राट जरासंध की शौर्य गाथा"

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मगध की पावन भूमि और राजगीर की अभेद्य पहाड़ियों की गूँज आज भी भारत के एक ऐसे प्रतापी सम्राट की गाथा सुनाती हैं, जिनके नाम मात्र से बड़े-बड़े शूरवीर कांप उठते थे। वे थे **मगध सम्राट जरासंध**। महाराज जरासंध केवल एक राजा नहीं, बल्कि उस युग के प्रथम **चक्रवर्ती सम्राट** थे, जिन्होंने अपनी भुजाओं के बल पर आर्यावर्त के 86 राजाओं को पराजित कर अपने अधीन किया था। ## अद्भुत जन्म और 'जरासंध' नाम का रहस्य मगध के राजा बृहद्रथ की कोई संतान नहीं थी। ऋषि चण्डकौशिक के आशीर्वाद से उन्हें एक फल प्राप्त हुआ, जिसे राजा ने अपनी दो पत्नियों को आधा-आधा खिला दिया। फलस्वरूप, दोनों रानियों ने बालक के दो आधे-आधे शरीर के हिस्सों को जन्म दिया। भयभीत होकर राजा ने उन मांस के लोथड़ों को वन में फिकवा दिया। वहाँ **'जरा'** नामक एक राक्षसी ने उन दो टुकड़ों को जोड़ा, और जुड़ते ही वे एक जीवित बालक बन गए। 'जरा' द्वारा संधित (जोड़े जाने) के कारण ही उनका नाम **जरासंध** पड़ा। ## वीरता की पराकाष्ठा: अजेय मगध जरासंध की वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण उनके और भगवान श्री कृष्ण के बीच हुआ संघर्ष है। जरासंध के दामाद ...

महाराज बृहदत जी (चंद्रवंश क्षत्रिय)

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 महाराज बृहद्रथ (बृहदत) प्राचीन मगध के प्रतापी और धर्मनिष्ठ शासक थे। उनका उल्लेख में मगध वंश के आदिपुरुष के रूप में मिलता है। उनकी राजधानी गिरिव्रज (वर्तमान राजगीर) थी। वे पराक्रमी होने के साथ-साथ न्यायप्रिय और प्रजावत्सल माने जाते थे। राज्य समृद्ध था, परंतु उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख था। संतान की कामना से उन्होंने कठोर तपस्या की। एक महर्षि (कथा में प्रायः चंडकौशिक का उल्लेख मिलता है) ने प्रसन्न होकर उन्हें एक दिव्य फल प्रदान किया और कहा कि इसे अपनी रानियों को खिलाएँ। बृहद्रथ की दो रानियाँ थीं, इसलिए उन्होंने फल को दो भागों में बाँटकर दोनों को दे दिया। समय आने पर दोनों रानियों ने आधा-आधा शिशु जन्म दिया। यह अद्भुत और विचित्र स्थिति देखकर वे अत्यंत व्यथित हुईं और उन अर्धशरीरों को त्याग दिया। कथा के अनुसार वन में जरा वन देवी (अर्थात मां भवानी) की कृपा से उन दोनों भागों का संयोग हुआ और एक पूर्ण, जीवित बालक प्रकट हुआ। इस दिव्य संयोग के कारण बालक का नाम “जरासंध” रखा गया—अर्थात जरा द्वारा संधित (जुड़ा हुआ)। यही बालक आगे चलकर मगध का महापराक्रमी सम्र...

सनातन धर्म के बारे में फैलाया गया भ्रम।

🚩हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब धर्म के उत्थान और  अधर्म के नाश के लिए में आता हूँ. 👉हिंदू धर्म के बारे में फैलाए गए भ्रम👈 हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं के कारण हिन्दू धर्म में कई ऐसी अंतरविरोधी और विरोधाभाषी विचारधाराओं का समावेश हो चला है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा की देन है। लेकिन उन सभी विचारधाराओं का सम्मान करना भी जरूरी है, क्योंकि धर्म का किसी तरह की विचारधारा से संबंध नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ ‘ब्रह्म ज्ञान’ से संबंध है। ब्रह्म ज्ञान अनुसार प्राणीमात्र सत्य है। सत्य का अर्थ ‘यह भी’ और ‘वह भी’ दोनों ही सत्य है। सत् और तत् मिलकर बना है सत्य। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जो व्यक्ति जिस भी धर्म में जन्मा है, वह उसी धर्म को सबसे प्राचीन और महान मानेगा। सत्य को जानने का प्रयास कम ही लोग करते हैं। हजारों वर्ष की लंबी परंपरा के कारण हिन्दू धर्म में कई तरह के भ्रम फैल गए हैं। इन भ्रमों के चलते सनातन हिन्दू धर्म पर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। हम आपको बताएंगे कि वे कौन से भ्रम हैं और आखिर उनमें कितनी सचाई है। ऐसे ही 16 तरह के भ्रमों की जानकारी...

संछिप्त क्षत्रिय चंद्रवंशी इतिहास

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🔱हर हर महादेव 🚩 जय जारा माँ 🚩 जय जरासंध       ( संछिप्त क्षत्रिय चंद्रवंशी इतिहास ) प्राचीनकाल में भारत विश्व का सबसे श्रेष्ठ देश था, इसेे विश्व के गुरु होने का गौरव भी प्राप्त है। विश्व के इतिहास में भारत का नाम स्वर्ण वर्ण में अंकत है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, औद्योगिक वैज्ञानिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में भारत अपनी सफलता के लिए प्रसिद्ध था। विश्व के सभी राष्ट्र भारत के सामने नतमस्तक रहे थे। भारत की गरिमा से प्रभावित होकर मानव को क्या कहा जा सकता है भगवान भी भारत की पावन धरती पर आने के लिए ललायित पाठ। वेद, पुराणों, ग्रथों के अध्ययन से यह स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि समय पाकर भगवान भी भारत के पावन धरती पर अवतरित हो नरलीला 'करने का काम किया है और कालान्तर में चलकर प्रसिद्धि प्राप्त की है। भारत के निर्माण में, इसमें वास करने वाले पूरे प्राणियों का हाथ रहा है। लेकिन निर्माण के निर्माण एवं कर्म क्षेत्र के आधार पर की गयी वर्ण व्यवस्था के बाद भारत के गौरव को बढाने में क्षत्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका जारी है। क्षत्रिय परिवार में दो वंशो के क्षत्रियों ने...

होत वही जो राम रची राखा"

💥🔆सुप्रभात🔆💥 *"होत वही जो राम रची राखा"* एक  बार  स्वर्ग  से  घोषणा हुई  कि  *भगवान  सेब  बॉटने आ  रहे  है*  सभी  लोग भगवान  के  प्रसाद  के  लिए तैयार  हो  कर  लाइन लगा कर  खड़े  हो  गए। *एक  छोटी  बच्ची  बहुत उत्सुक  थी*  क्योंकि  वह पहली  बार  भगवान  को देखने  जा  रही  थी। एक  बड़े  और  सुंदर  सेब  के साथ  साथ  भगवान  के दर्शन  की  कल्पना  से  ही खुश  थी। अंत  में  प्रतीक्षा  समाप्त  हुई। बहुत  लंबी  कतार  में  जब उसका  नम्बर  आया  तो *भगवान  ने  उसे  एक  बड़ा और  लाल  सेब  दिया।* लेकिन  जैसे  ही  उसने  सेब पकड़ कर  लाइन  से  बाहर निकली  उसका  *सेब  हाथ  से छूट कर  कीचड़  में  गिर गया*।  बच्ची...

◆सनातन धर्म किसे कहते हैं?

🔱 हर हर महादेव 🚩 जय माँ भवानी ◆ सनातन धर्म किसे कहते हैं? ★सनातन धर्म अपने मूल रूप हिन्दू धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है। [1] वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये 'सनातन धर्म' नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। [2][सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं। हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया...

★सनातन धर्म की मुख्य मान्यता◆

🔱हर हर महादेव 🚩जय माँ भवानी ★सनातन धर्म की मुख्य मान्यता◆ ■आइये जानते है हिन्दू सनातन धर्म की 10 मुख्य और प्रमुख मान्यता। 1. वेदों में ईश्वर को निराकार बताया गया है और पुराणों में उनकी आकार रूप रंग की व्याख्या की गयी है। 2. सनातन धर्म साकार और निराकार रूप में ईश्वर के अस्तित्व पर जोर देती है। 3. आप किसी भी ईश्वर की पूजा करते हो। पूजा परब्रहम परमात्मा की ही होती है। 4. आत्मा को अमर बताया गया है वो न ही जन्म लेती है ना ही मरती है।आत्मा या तो दूसरी योनी में जाती है या मोक्ष को प्राप्त करती है। यह सब उसके किये गये कर्मो पर निर्भर करता है। 5. ईश्वर की पूजा करने के पीछे किसी तरह का डर नही , अपितु उसका धन्यवाद करना है। 6. जब जब पाप चरम पर होगा तब ईश्वर अपने अवतार धारण करेंगे। उनके लिए अवतार अधर्म का नाश करेंगे। 7. पुण्य दूसरो की सेवा में है और किसी को सताना पाप है। 8. यदि आप किसी जीवमात्र की सेवा करते है तो यह ईश्वर की सेवा के तुल्य ही है। 9. लोभ , लालच , क्रोध , सांसारिक मोह माया से उठकर जीवन जीना ही धर्म है। 10. हिन्दू उपनिषदों के अनुसार सबसे बड़ी शक्ति परब्रह्म परमेश्वर है जिसे आप शिव कहे...