संछिप्त क्षत्रिय चंद्रवंशी इतिहास


🔱हर हर महादेव
🚩 जय जारा माँ
🚩 जय जरासंध

      ( संछिप्त क्षत्रिय चंद्रवंशी इतिहास )

प्राचीनकाल में भारत विश्व का सबसे श्रेष्ठ देश था, इसेे विश्व के गुरु होने का गौरव भी प्राप्त है। विश्व के इतिहास में भारत का नाम स्वर्ण वर्ण में अंकत है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, औद्योगिक वैज्ञानिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में भारत अपनी सफलता के लिए प्रसिद्ध था। विश्व के सभी राष्ट्र भारत के सामने नतमस्तक रहे थे। भारत की गरिमा से प्रभावित होकर मानव को क्या कहा जा सकता है भगवान भी भारत की पावन धरती पर आने के लिए ललायित पाठ। वेद, पुराणों, ग्रथों के अध्ययन से यह स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि समय पाकर भगवान भी भारत के पावन धरती पर अवतरित हो नरलीला 'करने का काम किया है और कालान्तर में चलकर प्रसिद्धि प्राप्त की है।

भारत के निर्माण में, इसमें वास करने वाले पूरे प्राणियों का हाथ रहा है। लेकिन निर्माण के निर्माण एवं कर्म क्षेत्र के आधार पर की गयी वर्ण व्यवस्था के बाद भारत के गौरव को बढाने में क्षत्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका जारी है। क्षत्रिय परिवार में दो वंशो के क्षत्रियों ने अपने बलिदान, बलिदान, और कर्नबर्न से देश श्रेष्ठ बनाने का काम किया है जो किसी से छिपा नहीं है। भारत का नामकरण भी चन्द्रवंशी क्षत्रिय राजा भरत के नाम पर ही हुआ है। इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिसने अपने पराक्रम से इतिहास की दिशा ही बदल दी। ग्रथों में अपना इतिहास अपने हाथों से लिखने और पाने का काम किया है। चन्द्रवंश के ही पराक्रम, न्याय, दानी और त्यागी राजा नवाश ने भगवान 'इन्द्र' की भी गद्दी को भी सम्वादने का काम किया है। राजा नवाश के विवाह माता पार्वती एवम महादेव शंकर के पुत्री अशोक सुंदरी से हुआ था।

द्वापर युग में अहंकार, अन्याय, शोषण, हमले से आमलोगों को मुक्ति दिंलाने के लिए अपने ही परिवार के महान् & पराक्रमी इतिहासों से "कुरूक्षेत्र" के मैंदान में एक 'महान धर्मयुद्ध' लड़ने के काम किए जो "महाभारत" के नाम से देश- देश विदेश में जाना जाता है। इस महान युद्ध में भगवान विष्णु को 'कृष्ण' के रूप में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश में ही अवतार के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ा था।

आज हम जो किसी भी महान ग्रंथो, वेदों और पुराणों का अध्ययन करते हैं “चंद्रवंशी क्षत्रिय” वंश की महता आसानी से समझी जा सकती हैं। लेकिन संसार में परिवर्तन हमेशा चलता रहता है। उसी क्रम में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश के उत्थान की गति रुकी और पतन की गति प्रारम्भ हो गई। महाराज जरासंध जो एक विशाल मगध साम्राज्य के राजा थे, चन्द्रवंश क्षत्रिय वंश के अंतिम चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और बाद में 'महानंद' ने 'मगध साम्राज्य' पर अपना अधिपत्य जमाकर ऐसा शोषण, परिष्करण और आतंक का वातावरण बनाया कि चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को अपना घर द्वार छोड़कर अन्य स्थानों पर भागना पड़ा। उसी समय से इस वंश का सिलसिला शुरू हुआ, जो काल परिवर्तन होने पर भी रुकने का नाम नहीं लिया। लेकिन समय ने पलट कर और इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिन्होंने भारत की गुलामी के समय में सन् 1868 में एक जगह बैठकर देश की गुलामी से मुक्ति पाने सहित चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं पर गहरा योगदान दिया। किया गया।

एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी लेना और दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्रों में एकता बनाकर चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को पूर्व के गौरव सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाना। इन दोनों कार्यों को एक साथ करना, उस अंग्रेजी हुकूमत के समय आसान काम नहीं था। फिर भी हमारे मनीषियों ने दोनों क्षेत्र में चिंतन और कार्रवाई जारी रखी।

इसी क्रम में स्व ० नथुनी प्रसाद सिंह जी का प्रादुर्भाव हुआ। सितंबर 1856 ई ० में पटना सिटी के मारगगंज में जन्मे बाबू नथुनी जी का लालन पालन बहुत ही सुखी माहौल में हुआ। उनके पिता बाबू श्यामलाल सिंह जी उस ज़माने के जाने माने एजेंट और आर्डर बोर्ड थे। बालक नथुनी जी ज्यों ज्यों बड़े हुए सादगी और व्यव्हार से ओत प्रोत होते गए और आगे चलकर उन्होंने चन्द्रवंशी समाज के अलावे शोषितों, दलितों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

समाज सेवा के इसी दौर में अपने छिपे हुए लोगों की खोज की प्रक्रिया में सन् 1906 में एक राष्ट्रिय मंच की स्थापना की, जिसका नाम "ऑल इण्डिया चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा" रखा। इसके कार्यकारिणी में बंगाल से लेकर लाहौर तक लोगों का प्रतिनिधित्व किया गया।

सन् 1912 ई ० में भारत के जनगणना विभाग के प्रमुख से मिलकर उन्होंने चंद्रवंशियों के इतिहास की जानकारी दी और भारत कंपनी एक्ट 1882 के तहत महासभा का पंजीकरण "अखिल भारतवर्षीय चन्द्रवंशी क्षत्रिय महासभा" नाम से किया।

महासभा के स्थापना के बाद चन्द्रवंशी क्षत्रिय परिवार के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं के क्षेत्र में विकासमूलक कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया, जिसके क्रांतिकारी कदम का विरोध उस समय के सामंती वर्ग और अंग्रेजी हुकूमत के हुक्मरानों ने किया है। क्योंकि जहाँ भी महासभा सामाजिक लड़ाई उस समय की व्यवस्था से लड़ रही थी, जो अंग्रेजी हुकूमत के हिमायती थे, वहीं देश के आजादी की लड़ाई के लिए कार्यकर्ताओं को भी शिक्षित करना था। परिणाम यह निकला कि महासभा के पदाधिकारियों को खुनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी। जेल के शिकंजो में बंद होना पड़ा। जाने वाले जाने पड़ी एवम घर के दरवाजे को छोड़कर अपने देश में ही शरणार्थी होना पड़ा। लेकिन महासभा के पदाधिकारियों, समर्थकों और सदस्यों ने अपने अभियान को जारी रखा।

महासभा ने सन् 1918 ई ० तक स्व ० नथुनी प्रसाद सिंह के नेतृत्व में उस समय के राजे, राजेंद्र, नवाबों और अंग्रेजी हुकूमत के हुकामरनों से संघर्ष किया और उत्तरोत्तर गति से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही। बाद में डॉ ० मुरलीधर सिंह, अमरनाथ सिंह, गोपीनाथ सिंह, महादेव सिंह, शिवनारायण सिंह, राय साहब सनातन सिंह, अमीचंद सिंह, शालिग्राम सिंह, गंगा प्रसाद सिंह, शिवम सिंह, मंगल प्रसाद, प्राणनाथ सिंह, नंद लाल सिंह, पोन सिंह त्रिवेणी नाथ दास, डॉ ० रामरतन सिंह के नेतृत्व में महासभा के कार्यक्रम लाहौर से लेकर बंगाल तक सफलता पूर्वक चलता रहा है।

सामजिक सम्मान के साथ लोग देश की गुलामी की जंजीर तोड़ने के लिए अपने जीवन की बिना कीमत मांगे देश की आजादी की बलिबेदी पर अपनी कुर्बानियां देना शुरू कर दिया। इसमें स्व ० पलु चन्द्रवंशी भोजपुर, भगवानलाल मुजफ्फरपुर, स्व ० छेदीदास, बालकेश्वर चन्द्रवंशी (चंद्रगढ़, नवीनगर) जी का नाम देश की आजादी के लिए शहीदवाले मंदिरों की सूची में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। अन्य हजारों की संख्या में शहीद हुए क्षत्रिय चंद्रवंशियों का नाम उसी तरह गायब हैं, जैसे बने भवन के नींव में पड़ी ईंट का होता हैं।

लेकिन अफ़सोस की बात यह हो रही है कि महासभा द्वारा संचालित पूरे क्रन्तिकारी कदमों पर उस समय विराम लग गया जब हमारा मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ।

उस समय हमारे मनीषी आजादी का जश्न मनाने में लग गए जो करीब 26 जनवरी 1950 तक जारी रहा। अवधि की निष्क्रियता ने ना आजाद मुल्क में चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार की भागीदारी ही सुनिश्चित करा पाए और ना महासभा के बढ़ते कदम ही ही -यम रख सकी। फल तो आपसी विवाद गहराया, एकता टूटी और चंद्र लोगों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए महासभा के अंदर जंग छेड़ दिया और 1968 के दशक में महासभा को कमजोर करने का काम किया। जहाँ हमारा संगठन लाहौर, दिल्ली, शिमला, गोरखपुर, बनारस, गाजीपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर, मुगलसराय, बंगाल, उड़ीसा, दानापुर, पटना, गया, छपरा, धनबाद आदि स्थानों पर सन 1918 में ही बन गया था।

सभी शाखाओं का विस्तार ग्राम सभा, पंचायत सभा, थाना सभा, जिला सभा, प्रदेश सभा स्तर पर करने का काम जिस गति से 1947 के पूर्व तिथि 1950 से 1964 के दशक तक विराम लग गया। हम तम चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के लिए यह अवधि भारी नुकसानदेह हो रही है। 1964 से 1970 के दशक तक स्व ० टी ० एन ० दास, कोकिल प्रसाद सिंह और स्व ० शिवदास सिंह के नेतृत्व में सभी विचारधाराओं को एक साथ जोड़कर महासभा का कार्य दागनी गति से दूर हो गया और गांव में निवास करने वाले सभी चंद्रवंशी पुलिस और बहनों को महासम्मेलन, सम्मेलन , प्रचार सभा, रैली और प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर महासभा के साथ जोड़ा गया जो 1970 से 1980 के दशक तक कायम रहा और बड़े पैमाने पर ग्राम, पंचायत, थान , प्रखंड, जिला एवं प्रदेश स्तर तक शाखा सभाओं का गठन हुआ। नव जवानों और नव युक्तियों में जागरूकता आयी। लोगों को संगठन के प्रति प्रेम जगा। संगठन में राजनीतिक प्रस्ताव युवाओं द्वारा उठाया गया। राजनीतिक प्रस्ताव के माध्यम से भारतीय राजनीति में चंद्रवंशी परिवार की भागीदारी सुनिश्चित करने की लड़ाई सड़कों पर आना शुरू हो गई है।

1980-1990 के दशक में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। आशिक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक कुरीतियों से जमकर लड़ने की योजना बनी। 8 मार्च 1994 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में चंद्रवंशियों की विराट रैली का आयोजन किया गया जिससे पटना की सड़के भर गई। गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रति सम्मान पैदा हुआ। आपसी एकता का प्रदर्शन करने के लिए आम लोगों को परीक्षण किया गया। राजनीतिक दलों से जुड़ने के लिए नौजवानों और संस्थाओं को प्रेरित किया गया। अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शन के तरीकों आदि तरीकों से सरकार के सामने रखने के लिए निवेश बनाया गया और कार्यान्यवन के लिए दिशा तय की गई। सन् 1990 से 2000 के दशक तक आम चंद्रवंशी परिवार के चौमुखी विकास के लिए एक योजना बनाई गई।

सर्वप्रथम तिलक दहेज जैसी दानवी शक्ति से सामना के लिए वर्ष 1998 में "चंद्रवंशी सामूहिक विवाह" का आयोजन बोधगया की पावन धरती के कालचक्र मैदान में शुरू किया गया जिसमें असन्त सफलता मिली और समाज के हर वर्ग द्वारा प्रशंसा की गई। सशर्त, रैली, महासम्मेलन, सम्मेलन आदि के माध्यम से तत्कालीन सरकार को चंद्रवंशी एकता का एहसास भी कराया गया। हमारे विधानसभा के परिणामस्वरूप, विधान परिषद के टिकट राजनीतिक दलों से दिए गए। आज का लाभ चंद्रवंशी परिवार को मिला। सन 2001 से 2006 तक महासभा ने प्रारंभ में अपनी एकता से झारखंड प्रदेश के सरकार को अपनी ताकत दिखाने का काम किया। साथ ही देवघर के महासम्मेलन की सफलता ने पूरे भारतवर्ष के स्थान मसीह परिवार के सामाजिक राजनीतिक शैक्षणिक आर्थिक सांस्कृतिक दिवाली वे में विकास के सभी मार्ग खुले दिए थे। हमारी युवा शक्ति में एक नया जोश आया था। उनका मनोबल बढ़ा था। महासभा के प्रति उन्हें सम्मान पैदा हुआ था।
भारत के केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों और राजनीतिक दलों में हलचल पैदा हो गई थी कि चंद्रवंशी परिवार में एकता बनी हुई है। यह अपने अधिकारों के लिए मरने-मारने को तैयार है। यदि इसका अधिकार उन्हें नहीं दिया गया तो छीनने में सक्षम है। उनके उत्थान का सारा वातावरण इनका केंद्रीय मंच अ ० भा ० च ० अ ० महाभब ने बनाया है, उसे मना नहीं किया जा सकता है। लेकिन अल की बात रही है "देवघर" महासम्मेलन के प्रदर्शन के बाद हमारे बढ़ते कदम पर फिर विराम लग गया। फल तो उसके बाद के बिहार और झारखंड प्रदेश में होने वाले चुनावों में हमें तरजीह नहीं दिया गया और समझा गया कि हमारी वो ताकत नहीं है। हम बिखरे हैं खंडो में विभाजित हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। आज हमारी महासभा अपनी स्थापना के 100 वर्ष पार कर गई है। इस अवधि में महासभा के सामने कई बाधाएँ आयीं,

महासभा देश के तम चंद्र चंद्रवंशी परिवारों को यह विश्वास दिलाती है कि बुजुर्गों का आशीर्वाद, वयस्कों का कंधा से कंधा मिलाकर साथ और नौजवानों की कुर्बानी मिले तो दुनिया की कोई भी ताकत आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती है। आज महासभा के संगठन को पारदर्शी बनाना होगा। आर्थिक दृष्टिकोण से प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागना होगा। सामूहिक नेतृत्व में काम करने की आदत बनानी होगी। दलगत भावना को त्यागना होगा। युवाशक्तियों में सम्मान पैदा करके आगे लाना होगा। हर स्तर पर प्रशिक्षण शिविर लगाकर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को प्रशिक्षण देना होगा। वर्तमान के बुजुर्गों को आने वाली पीढ़ी के मार्ग प्रशस्त करने के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना होगा।

👉क्यों चंद्रवंशी क्षत्रिय चंद्रवंशी कहार बन गए🙄🙄

       प्रेसक
✍️रविकेश सिंह चंद्रवंशी
8810449003

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